११ दिसम्बर, दिल्ली की ठंडी शाम रात के अंधेरों में घुल रही थी..
बड़े दिनों से कोई नाटक नहीं देखा था.. बड़े उत्साह से एक ऐसे नाटक को देखने आ पहुंची जिसकी स्त्रोत कहानी पढ़ी थी और पसंद भी की थी..
कुछ ८० मिनट के लिए.. वो नाटक ही मेरी नयी-पुरानी दुनिया बन गया..
और यहाँ हैं कुछ बातें जो नाटक ने कही तो नहीं पर मैं साथ वापिस ले आयी...
म्मताज़भाई पतंगवाले
कहानी, किरदार, अदाकार के बारे में क्या कहूँ.. देखने वाले जानते हैं और समझते भी हैं..
मास्टर जी की अंग्रेजी हो या कसम और कसम काटने के मंतर, माँ का बहुत 'डेंजर' होना.. और बचपन के विशवास और सपनों का... धड़ाम! देखते - देखते बचपन का छोटा-मोटा कोना मिल गया.. उधर बिक्की की लूटी हुई पतंग फाड़ी गयी, इधर एक लड़की को अपनी एक स्क्रैपबुक फाड़े जाने का अवसर याद आ गया.. खैर.. और साथ ही याद आये बचपन के वो सारे म्मताज़भाई...
बुलडोज़र का ड्राईवर मेरे लिए दुनिया का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति था.. बुलडोज़र चलाना मेरा सपना.. जब सड़क पे कोई बुलडोज़र चलता तो बाकी सभी लोग संभाल के रास्ता छोड़ने लगते.. और छोटी-मैं बड़ी ख़ुशी से सोचती की चलाने वाले को कितना मज़ा आता होगा.. पता नहीं लोग कार क्यूँ लेते हैं.. बुलडोज़र लेना चाहिए.. कितना मज़ा है.. फिर ख़याल आता की महंगा होगा शायद.. एक दिन मन ही मन ठान लिया, मैं बड़े होके बुलडोज़र खरीदूंगी..
बुलडोज़र का रुआब ही गजब था..!
आइसक्रीम वाला भी एक महानायक हुआ करता था.. ठेले का वो ढक्कन खुलता और अन्दर से एक नया जहाँ बाहर झांकता.. ठेले के अन्दर की उस दुनिया में इस दुनिया की सबसे अनमोल चीज़ छुपी रहती थी... डिस्को कैंडी.. प्लास्टिक के लम्बे पैकेट में.. अलग अलग रंगों की.. डिस्को कैंडी.. एक रुपये मात्र.. !
एक रूपया तो मैं यूँही गुल्लक से निकाल लेती थी.. गुल्लक को बिना फोड़े सिक्का डालने के छेद से सिक्का बाहर निकालना, छोटी-मैं के लिए यह एक महान कला थी.. बड़ी शान से सिक्का निकाला जाता.. लेकिन आइसक्रीम के ठेले पे पहुँच के सारी शान विस्मय में बदल जाती.. नायक होने का सेहरा छोटी-मैं के नन्हे सर से उतर कर उस महान आइसक्रीम वाले को भेंट हो जाता..
गुल्लक हमेशा अधखाली - अधभरी रही..
बागेश्वर..
किताबों-कागजों में डूबे एक नाना जी.. कभी फूलों - पौधों की देखभाल करते.. कभी कुछ लिखते रहते.. और फिर वो शानदार विचित्र वस्तु - टाइपराईटर .. उसकी खट-खट में क्या शान थी.. संगीत से भी बेहतर.. टाइपराईटर की रिबन बदलते देखना, जीवन का महान अनुभव.. साढ़े-तीन साल की छोटी-मैं अकसर बागेश्वर के उस छोटे से स्कूल से भाग जाती थी जहाँ मुझे समय काटने के लिए भेजा जाता.. बचपन में शायद मेरे दिन में अड़तालीस घंटे हुआ करते थे.. स्कूल में ब्रेक की घंटी बजती और मेरे लिए वो छुट्टी की घंटी हो जाती.. बड़ी शान से सड़क किनारे बने, दो कमरे के उस स्कूल से मैं चल देती.. कभी बस्ता पीछे छोड़, कभी साथ उठाये.. स्कूल से घर के रास्ते में दुनिया की सबसे रहस्यमयी, जादुई दुनिया थी.. लाल पत्थरों वाली कॉलेज की बिल्डिंग.. यहीं तो नाना जी रहते थे.. सब बड़े-बड़े भैया-दीदी उन्हें सर कहते थे.. मैं बड़ी शान से नाना जी के सम्मुख प्रस्तुत हो जाती.. और फिर कॉलेज के किसी स्टाफ के साथ मुझे घर भिजवाया जाता.. यह पूरा कार्यक्रम मेरे दिन की उपलब्धि हुआ करता था.. और नाना जी इसके नायक.. सब उनसे डरते थे.. इज्ज़त देते थे.. और फिर वो.. टाइपराईटर.. वो भी तो नाना जी के इशारे पे चलता था..
बड़े सारे नायक और हुए.. पड़ोस के भैय्या जो बिना रुके पूरी कविता बोल सकते थे.. दसवीं में पढने वाले छोटे मामा कॉमिक्स बनाते थे, कितना बढ़िया रंग करते थे.. कॉमिक्स पढना सीखा तो लगा पापा ही फैंटम हैं.. सुपरहीरो!
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बड़े होते-होते नए बचपने सीख लिए
उफ़.. बुलडोज़र भी नहीं खरीद पायी अब तक..! :)
सीख भी लेंगी और खरीद भी - शुभकामनाएं
ReplyDeleteAah ! Aha ! Adbhut !!!
ReplyDeleteLoved it truly...