Friday, March 4, 2011

a dream is but a dream...



मैं ‘science is propaganda’ चिल्लाते हुए दौड रही थी | हालाँकि आवाज़ जानी-पहचानी नहीं थी, फिर भी मुझे यकीन है कि वो मेरी ही आवाज़ थी |
वक़्त का अंदाजा तो नहीं, कुछ दो या तीन बजे होंगे.. रात के | अजीब जगह थी... सामने एक किला था, ईंटो का.. कोई सीमेंट नहीं.. जोड़ नहीं.. एक के ऊपर एक ईटें टिकीं थी बस |

सफदे कुर्ते-पजामे में खड़ा एक आदमी, उस किले को बेच रहा था... 'ले लीजिये साहिब, ले लीजिये.. कमाल चीज़ है.. आप यकीन नहीं करेंगे ये रातों रात बना था... ऐसी चीज़ का कोई मोल-भाव करता है भला.. अरे इनसे पूछिए.. बताइए बहनजी, रातों-रात बना था ना ये.. क्या मोल-भाव करना..?'

मैं, बहनजी.. मैं...?? आसपास देखा, कोई आइना भी नहीं.. फिर उस सफ़ेद कुर्ते वाले को देखने लगी.. पता नहीं क्या ख्याल आया.. 'हाँ रातों-रात बना था..'  (बस ये मत पूछना कब)

मैं जोरों से हंसने लगी.. सफ़ेद कुर्ते वाला घबरा गया 'बहनजी...!'
'बहनजी...?' मैं हंसती ही रही
'ईटें गिर सकती हैं, हंसिये मत' उसने कहा
'ईटें गिर सकती हैं..? तो तुम फिर से टिका देना.. करना ही क्या है.. अजीब ईटें हैं.. हंसने से गिर जाती हैं..| कभी तुमने संसद की ईटें गिरती देखी हैं..? या फिर चीन की दीवार को गिरते सुना है..?
ऐसे  क्या देखते हो..? अब ये मत पूछना कि वहाँ कौन हंसता है... हा हा हा..'

मैं सड़क कि तरफ दौड़ पड़ी, फिर ख्याल आया.. मेरे साथ तो कोई था.. कौन था..?
फिर कोई अपने आप साथ चलने लगा.. मुझे याद नहीं वो कौन है.. कोई तो है..

सड़क नहीं थी |
वहां नदी जैसा कुछ बह रहा था.. लेकिन काला, गहरा काला.. गाढ़ा.. 
मैं उसके ऊपर छलांगे मार के चल रही थी.. वो 'कोई' भी साथ में ही था.. 
'अजीब पानी है' मैंने कहा 'हम डूबते ही नहीं' 
मैंने मुड़ के उसे देखा.. कोई जवाब नहीं | 

छलांगे मारते हुए, हम उस किले के सामने से गुज़रे.. मैं हंस पड़ी.. सामने कि तरफ खड़ी मीनार थोड़ी हिली.. और जोरों से हंसने का मन हुआ...
मैंने मुड़ के उसे देखा.. कोई हंसा नहीं | 

सामने मैदान था.. नीला... सफ़ेद चिकत्तों वाला.. जैसे ही नीले पे पैर रखते, डूबने लगते.. मैं और वो एक सफ़ेद चिकत्ते से दुसरे सफ़ेद चिकत्ते पर कूद रहे थे.. ना डूबने के लिए ये ज़रूरी था |
'तुमने कभी सोचा है.. जिसे हम आसमान कहते हैं, वो असल में एक समुद्र हो.. बस उलटा रखा.. और क्यूंकि वहाँ.. वहाँ ऊपर.. भी एक gravitational force है.. इसलिए वो समुद्र गिरता नहीं.. जैसी हम यहाँ ज़मीन पे खड़े होके देखते हैं.. ऊपर सब नीला.. वहाँ से कोई देखता होगा.. ऊपर सब नीला..' वो कूदते-कूदते दूर सा जा रहा था.. मैंने आवाज़ ऊंची कर ली.. 
'अब तुम्हें इतना तो मानना पड़ेगा.. के जैसे हमारी ज़मीन के ऊपर उनका.. हाँ हाँ.. उन ऊपर वालों का समंदर दिखता है.. वैसे ही उनकी ज़मीन से हमारा समंदर दिखता होगा.. अरे.. यहाँ तो तीन-चौथाई पानी ही है..' वो पास के ही चिकत्ते पे था, उसने सिर हिलाया और ऊपर देखा..

ऊपर सब कुछ हरा था... मेरी बातें बेमानी होती जा रहीं थी... मैं तेज़ी से यहाँ से वहाँ कूदने लगी.. 'Science is propaganda'
थोडा रुक कर मैंने कहा.. 'तुम्हें पता है...'
'फ़र्ज़ करो तुम एक हिस्टोरियन हो.. और मैं एक साइंटिस्ट...
मैं, Watson और Crick साथ में काम कर रहे हैं और तुम हमारे साथ हो.. तुम्हें मैं पसंद नहीं |
मैं DNA double helix model खोज निकालती हूँ.. सोचो उससे कितनी गुत्थियां सुलझ जायेंगी... तुम मैं.. सब कुछ नहीं हैं.. बस DNA ! A-C-T-G-C-C-A-G-T-T-C-A ऐसी ही sequences हैं बस.. जो कि जिंदा रहती हैं.. बढती हैं.. double helical structure की वजह से... 
समझ रहे हो तुम..? मैंने क्या खोज निकाला है.. !! अभूतपूर्व..!!
पर तुम्हें तो मैं पसंद नहीं.. तुम कहीं एक सड़ी-गली किताब में Watson और Crick का नाम लिख देते हो.. कुछ पचास साल बाद भी बच्चे उसे पढ़ते हैं.. और Watson - Crick, चाहे जैसे हों.. अमर हो जाते हैं.. 
तुम हिस्टोरियन कहीं के..! तुम ऐसा कैसे कर सकते हो..??? झूठ है ये सब.. हर एक बात झूठ है तुम्हारी..! science propaganda है तुम्हारा..!!' 
मैं कूदते-कूदते हांफने लगी तो रुक के देखा.. बातों का मतलब मुझे भी नहीं पता था.. बातें करने से अकेला नहीं लगता.. वो पास ही लगता है.. 
मैंने मुड़ के देखा.. वो आस पास कहीं नहीं था.. दूर भी नहीं.. बहुत दूर किसी सफ़ेद चिकत्ते पे.. कहीं नहीं..| 

(मुझे याद आ गया कि तुम कौन हो... इसीलिए नहीं हो..)


5 comments:

  1. "जिसे हम आसमान कहते हैं, वो असल में एक समुद्र हो.. बस उलटा रखा.. और क्यूंकि वहाँ.. वहाँ ऊपर.. भी एक gravitational force है..." बचपन में हम अक्सर ऐसा सोचते थे.
    इस पोस्ट को पढकर 'वाह' के सिवा कुछ और नहीं निकला...

    ReplyDelete
  2. बडी अच्छी पोस्ट रही करके :-)

    ReplyDelete
  3. वाटसन और क्रिक के साथ ’वो’ जो थी.. उसे हिस्टोरियन्स ने भुला दिये लेकिन किसी एक किताब में उसे एक लेखक ने जीवित रखा है.. सच है.. साईंस इज़ प्रोपागेंडा

    ReplyDelete
  4. पढ़ने के लिए शुक्रिया..!
    पता नहीं ये बताना कैसा रहेगा कि ये वाकई में एक सपना था..

    ReplyDelete
  5. मुझे याद आ गया कि तुम कौन हो... इसीलिए नहीं हो

    agli kab ?

    ReplyDelete